भारत में महिला निर्माण श्रमिक — निर्माण स्थल पर ईंटें ढोती महिलाएँ

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विकास की नींव में स्त्रियाँ: महिला निर्माण श्रमिकों का अदृश्य श्रम और समानता का सवाल

डॉ. मीनाक्षी पराशर 12 अक्टूबर 2026

जब भी हमारी दृष्टि किसी भव्य इमारत, विस्तृत सड़क, मेट्रो स्टेशन या तेजी से विकसित होते शहर पर पड़ती हैं, तो हमारा मन अनायास ही उसकी भव्य संरचना, अनूठे डिज़ाइन और उसकी ऊँचाइयों की प्रशंसा में खो जाता है। हम शिल्प की कलात्मकता को तो सराहते हैं, पर शायद ही कभी हमारी चेतना उन अदृष्य हाथों की ओर मुड़ती है जिन्होनें अपने पसीने की हर एक बूँद से उस मिट्टी को ईंट और कंक्रीट में ढ़ाला है।

गाजियाबाद में एक धूल भरी निर्माण-स्थल (कन्स्ट्रक्शन साइट) की यात्रा के दौरान जब मेरी मुलाकात महिला श्रमिकों के एक समूह पर पड़ी, तो वह दृश्य केवल आँखों के सामने से ही नहीं गुज़रा बल्कि मन के किसी गहरे कोने में अमिट छाप की तरह अंकित हो गया।

उस दृश्य को देखते हुए अनायास ही सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ याद आ गईं—

वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।

निराला की कविता में दिखाई देने वाली वह स्त्री जैसे समय को पार करके मेरे सामने खड़ी थी। अंतर केवल इतना था कि आज उसके हाथ में हथौड़े के साथ ईंटें, सीमेंट और निर्माण सामग्री भी थीं। वह केवल एक निर्माण स्थल पर काम नहीं कर रही थी। वह हमारे शहर का भविष्य बना रही थी।

निर्माण स्थल पर वे महिलाएँ ईंटें ढो रही थीं, सीमेंट और कंक्रीट मिला रही थीं तथा निर्माण सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा रही थीं। ये सभी शारीरिक रूप से बेहद मेहनत वाले कार्य थे फिर भी वे उन्हें अपने सामान्य कार्यदिवस का हिस्सा मानकर कर रही थीं। वे सुबह लगभग 7 बजे निर्माण स्थल पर पहुँचती थीं और शाम लगभग 5:30 बजे काम समाप्त करती थीं। उनके काम के घंटे लंबे थे और शारीरिक रूप से बेहद थकाने वाले थे।

लगभग दस घंटे का यह श्रम उनके लिए किसी असाधारण घटना की तरह नहीं था। यह उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी थी। उनके चेहरों पर थकान थी, लेकिन काम जारी था। शायद इसलिए कि उनके पास रुकने का विकल्प नहीं था। शायद इसलिए भी कि रोज़ की मेहनत उनके लिए केवल रोजगार नहीं थी—वह उनके परिवार के जीवन और भविष्य को चलाने का माध्यम थी।

यहीं से मेरे मन में एक बड़ा सवाल उठा— जिस शहर को बनाने में इन महिलाओं का इतना बड़ा योगदान है, उस शहर के विकास में उनका अपना हिस्सा कितना है?

दोहरी जिम्मेदारी: ईंटों के बीच बँटी हुई जिंदगी

उस दिन का एक छोटा-सा दृश्य मेरे मन में सबसे अधिक गहराई से दर्ज हो गया। कड़ी धूप और हाड़तोड़ मेहनत के बीच उनके 30 मिनट के विश्राम के दौरान मैंने देखा कि दो महिला श्रमिकों के साथ उनके छोटे बच्चे भी थे। जहाँ शरीर को चंद साँसों की फुर्सत चाहिए थी, वहाँ विश्राम की गुंजाइश कहाँ थी? विश्राम करने के बजाय वे उस समय भी अपने बच्चों की देखभाल कर रही थीं और उन्हें खाना खिलाने में जुटीं हुईं थीं।

इस छोटे-से दृश्य ने मुझे उन असंख्य महिला श्रमिकों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया, जो दोहरी जिम्मेदारी निभाती हैं। इन महिलाओं के लिए काम केवल निर्माण स्थल ईंटों और पत्थरों के साथ ही समाप्त नहीं होता बल्कि उनकी जिम्मेदारियों में बच्चों की देखभाल, घर का प्रबंधन और परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना भी शामिल है।

दिन के उजाले में वे निर्माण स्थल पर पसीना बहाती श्रमिक हैं तो ढलती शाम के साथ अपने घर की देखभाल करने वाली की माँ की भूमिका निभाती हैं। आर्थिक विकास की चर्चा करते समय इस तरह के भुगतान वाले और बिना भुगतान वाले श्रम की संयुक्त जिम्मेदारी अक्सर अनदेखी और अनकही रह जाती है।

हम अक्सर चर्चा करते हैं कि शहर तेजी से विकसित हो रहे हैं और बुनियादी ढाँचा बेहतर हो रहा है। लेकिन एक सवाल हमारे ज़ेहन में कम ही आता है कि इस विकास की शारीरिक और भावनात्मक कीमत आखिरकार कौन चुका रहा है?

कार्यस्थल पर गरिमा: बुनियादी सुविधा का अभाव और गरिमा का सवाल

निर्माण स्थल की अपनी यात्रा के दौरान जिस बात ने मुझे सबसे अधिक विचलित किया, वह थी श्रमिकों के लिए प्राथमिक मानवीय सुविधाओं विशेषकर शौचालय की सुविधा का अभाव। महिला श्रमिकों के लिए वहाँ कोई बुनियादी शौचालय सुविधा तक उपलब्ध नहीं थी।

मैंने उनसे पूछा कि वे मासिक धर्म के दौरान कैसे अपनी स्थिति संभालती हैं, तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया; वे केवल मुस्कुरा दीं।

उस मौन मुस्कान ने शब्दों से कहीं अधिक कह दिया। वह खुशी की मुस्कान नहीं थी बल्कि उसमें समाई थी एक गहरी असहजता, अपनी परिस्थिति को स्वीकार कर लेने की भावना और शायद एक करुण बोध कि वे अब ऐसी स्थिति की अभ्यस्त हो चुकी हैं।

“यहाँ पर शौचालय होना चाहिए… हमें बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।”

वाक्य छोटा था, लेकिन उसके भीतर एक पूरी व्यवस्था पर सवाल था। उस क्षण मुझे एहसास हुआ कि कभी-कभी श्रमिकों की सबसे बुनियादी आवश्यकताओं को भी वैकल्पिक सुविधा की तरह देखा जाता है जबकि वास्तविकता यह है कि शौचालय कोई विलासिता नहीं है, बल्कि मनुष्य का मूलभूत अधिकार है।

महिला श्रमिकों के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और उपयोग करने योग्य शौचालय तक पहुँच उनके सम्मान, स्वास्थ्य तथा सुरक्षित और सहज रूप से काम करने की क्षमता से सीधे जुड़ी हुई है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के शोध में भी भारत के छोटे निर्माण स्थलों पर महिला श्रमिकों के लिए खराब स्वच्छता सुविधाओं को एक महत्वपूर्ण चिंता के रूप में रेखांकित किया गया है।

वेतन में असमानता: मेहनत बराबर, मजदूरी अलग क्यों?

मैंने उन महिलाओं से उनके वेतन के बारे में भी बात की। उनका उत्तर बहुत सरल था।

“इतनी मेहनत करने के बाद भी हमें यहाँ काम करने वाले आदमियों से कम ही तनख्वाह मिलती है।”

यह भी एक ऐसा क्षण था जो मेरे मन में अपनी अमिट छाप छोड़ गया।

वे महिलाएँ शारीरिक रूप से कठिन काम कर रही थीं। वे ईंटें ढो रही थीं, कंक्रीट मिला रही थीं और निर्माण सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा रही थीं। फिर भी उन्होंने बताया कि उन्हें पुरुष श्रमिकों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने लगातार बनी हुई लैंगिक वेतन असमानता की ओर भी ध्यानाकर्षण किया है। 2025 में भारतीय निर्माण उद्योग पर प्रकाशित ILO की एक रिपोर्ट में बताया गया कि महिलाएँ अभी भी कम वेतन वाले कार्यों तक ही सीमित हैं और उन्हें आगे बढ़ने के अवसरों में संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

प्रवासी महिला श्रमिक: घर से दूर, सपनों से कितनी दूर?

निर्माण स्थल पर जिन अधिकांश महिलाओं से मेरी मुलाकात हुई, वे अलग-अलग राज्यों से आई थीं। इनमें से कई प्रवासी श्रमिक थीं, जो रोजगार की तलाश में अपने गृह-क्षेत्र से दूर चली आई थीं।

प्रवास का अर्थ अक्सर परिचित परिवेश, पारिवारिक नेटवर्क और सामुदायिक सहयोग से दूर हो जाना होता है। महिलाओं के लिए ये चुनौतियाँ और भी जटिल हो सकती हैं। उन्हें एक ओर आजीविका कमानी होती है, तो दूसरी ओर बच्चों की देखभाल, घरेलू जिम्मेदारियों और घर से दूर रहने तथा काम करने की कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है।

फिर भी प्रवासी महिला श्रमिकों को अक्सर केवल ऐसे श्रमिकों के रूप में देखा जाता है, जो काम करने के लिए उपलब्ध हैं। उनकी व्यक्तिगत कहानियाँ, कौशल, आकांक्षाएँ और चुनौतियाँ और संघर्ष समाज की दृष्टि में प्राय: अदृश्य और उपेक्षित ही रह जाता है।

इस अनुभव ने मुझे विकास के वास्तविक अर्थ के बारे में सोचने पर मजबूर किया। मैं स्वयं से यह प्रश्न करने लगी कि क्या हम किसी शहर को वास्तव में समावेशी कह सकते हैं, जब उस शहर को अपने श्रम से आकार देने वाले लोगों को ही कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधाएँ, गरिमा, अधिकार और सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियाँ उपलब्ध न हों?

अधिकार बनाम वास्तविकता: कागज पर हक और ज़मीनी हकीकत

भारत में ऐसे कानून, नीतियाँ और कार्यक्रम मौजूद हैं, जो समानता और श्रमिकों के अधिकारों को मान्यता देते हैं। कागज पर महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन मेरे क्षेत्रीय अनुभव ने मुझे कागज पर दिए गए अधिकारों और व्यवहार में उनके वास्तविक उपयोग के बीच की दूरी के बारे में सोचने पर मजबूर किया।

एक महिला को समानता का संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो सकता है, लेकिन यदि उसे अपने काम के लिए पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है, तो उसकी आर्थिक स्थिति को वास्तव में कितना समान कहा जा सकता है?

एक महिला को गरिमा के साथ जीने और काम करने का अधिकार प्राप्त हो सकता है, लेकिन यदि उसके कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधा शौचालय तक उपलब्ध नहीं है, तो उसके सम्मान और गरिमा की वास्तविक रक्षा किस प्रकार संभव है?

एक महिला कार्यस्थल का अभिन्न हिस्सा हो सकती है, लेकिन यदि उसके श्रम को केवल कम वेतन वाले शारीरिक श्रम के रूप में देखा जाता है, तो क्या उसके कौशल, क्षमता और योगदान को वास्तव में वह मान्यता मिल रही है, जिसकी वह हक़दार है?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल नीतियों के माध्यम से नहीं दिया जा सकता। इनके लिए प्रभावी क्रियान्वयन, निरंतर निगरानी और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, महिलाओं के श्रम को देखने, समझने और उसका मूल्य निर्धारित करने की सामजिक सोच में बदलाव आवश्यक है।

आगे का रास्ता: विकास की नींव में महिलाओं का सम्मान व समान अधिकार

यदि विकास केवल शहर की इमारतों की ऊँचाई बढ़ाता है, लेकिन उन इमारतों को बनाने वाले लोगों की जिंदगी को बेहतर नहीं बनाता, तो हमें विकास की अपनी परिभाषा पर फिर से विचार करना चाहिए।

एक समावेशी शहर वह नहीं है जिसमें केवल आधुनिक बुनियादी ढाँचा हो। एक समावेशी शहर वह है जिसमें बुनियादी ढाँचे का निर्माण करने वाले श्रमिकों की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाता है। स्वच्छ शौचालय, पीने का पानी, सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ और उचित विश्राम स्थल जैसी बुनियादी सुविधाओं को किसी अतिरिक्त सुविधा या विशेष लाभ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये प्रत्येक श्रमिक के सम्मानजनक और सुरक्षित कार्य-जीवन के लिए आवश्यक है।

महिला श्रमिकों को समान कार्य के लिए समान वेतन भी मिलना चाहिए। उनके कौशल को मान्यता दी जानी चाहिए और उन्हें कौशल-विकास तथा बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। केवल काम उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, काम की परिस्थितियाँ और उसमें आगे बढ़ने की सम्भावनाएँ भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

छोटे बच्चों वाली महिला श्रमिकों के लिए बाल-देखभाल की सुविधाएँ उनकी कार्य-स्थितियों को काफी बेहतर बना सकती हैं। इसी प्रकार, प्रवासी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं तक आसान और निरंतर पहुँच सुनिश्चित करना आवश्यक है, विशेषकर तब, जब वे रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित होती हैं।

भारत सरकार निर्माण श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी सहायता प्रदान करने के लिए भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक (BoCW) कल्याण व्यवस्था के माध्यम से कार्य कर रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और श्रमिकों तक उनकी पहुँच अभी भी महत्वपूर्ण विषय हैं क्योंकि वास्तविक समावेशी विकास वही होगा जिसमें शहरों के निर्माण में योगदान देने वाली महिलाओं को केवल श्रम का हिस्सा नहीं बल्कि विकास के अधिकार और अवसरों में भी बराबर की हिस्सेदारी मिले।

एक स्थायी प्रश्न: बढ़ती ऊँचाइयाँ और श्रम की अनसुनी आवाज़

गाजियाबाद के उस निर्माण स्थल की यात्रा ने मेरे शहर को देखने का नजरिया बदल दिया।

अब जब भी मैं कोई नई इमारत, सड़क या विकसित होता हुआ शहर देखती हूँ, तो मेरी नज़र केवल उसकी ऊँचाई और खूबसूरती पर नहीं ठहरती बल्कि मैं उन हाथों के बारे में सोचती हूँ, जिन्होंने उसे संभव बनाया है।

मैं उन महिलाओं के बारे में सोचती हूँ जो ईंटें ढो रही थीं। मैं उन महिलाओं के बारे में सोचती हूँ जो कंक्रीट मिला रही थीं। मैं उस माँ के बारे में सोचती हूँ, जो अपने छोटे-से विश्राम के दौरान अपने बच्चे को खाना खिला रही थी, और मुझे वह मुस्कान याद आती है, जो मुझे मासिक धर्म के दौरान शौचालय की सुविधा के बारे में पूछने पर मिली थी।

वह मुस्कान मेरे साथ रह गई है शायद इसलिए कि उसने मुझे यह समझाया कि असमानता हमेशा आँकड़ों और रिपोर्टों में दिखाई नहीं देती। कभी-कभी असमानता उन चीजों में दिखाई देती है, जिनके बिना जीना लोगों ने सीख लिया है।

महिला निर्माण श्रमिक केवल “मजदूर” नहीं हैं। वे ऐसे श्रमिक हैं, जो हमारे शहरों और हमारी अर्थव्यवस्था के निर्माण में प्रत्यक्ष योगदान दे रही हैं।

यदि हम वास्तव में समावेशी विकास चाहते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे शहरों का निर्माण करने वाली महिलाएँ स्वयं भी गरिमा, सुरक्षा, समानता और सम्मान के साथ काम कर सकें।

किसी शहर की ऊँचाई केवल उसकी इमारतों से नहीं मापी जानी चाहिए, उसकी वास्तविक ऊँचाई इस बात से भी तय होती है कि वह उन हाथों और उन जीवनों को कितना सम्मान देता है जिन्होनें उसे बनाया है।

और शायद जिस दिन हमारे शहरों की ऊँची इमारतों के साथ-साथ उन महिलाओं की जिंदगी भी ऊँची होने लगेगी— उसी दिन हमारा विकास सचमुच समावेशी कहलाएगा।

क्योंकि विकास की नींव में केवल ईंट और कंक्रीट नहीं होते— उसमें इंसानों का पसीना, सपने और जीवन भी शामिल होते हैं।